अग की बरीश
आग की बारिश में सोच के पीछे
मुझे अपने सीने में एक समस्या मिली!
काली देह की गर्जना भी
मैं रोते हुए कह रहा था कि यह कविता है
झोपड़पट्टी के अंदर कॊ॓ भीतर
हम भी कमल हैं !!
पानी बंद करने वाला कोई नहीं
मिटने की देर है !!
तड़क-भड़क की उम्र में भी
किनारा बांधने की कोशिश करो
फर्श के घर की दीवार पर भी
नमक बरस रहा है !!
सूली पर चढ़ाने के लिए काफी है
रो नहीं सकता सथियाम्मा
रो रो रो सब
हाथ न धोएं
पीछा में ज्ञात प्रकाश -एन
जल्द ही जा रहा हूँ
मेरे पोते के समय
क्या बुझ जाएगी जाति की आग
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